बीज़ेल ने यह ज़िम्मेदारी येल युनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर बेंजमिन सिलीमैन को सौंपी को वह इस पदार्थ पर स्टडी करें। 16 अप्रैल 1855 को यह स्टडी पूरी हो गई और रिपोर्ट भी तैयार हो गई लेकिन बेंजमिन ने अपने अध्ययन के बदले में 526 डालर की रक़म मांग ली।
बीज़ेल और उनके साथियों को लगा कि यह तो बहुत बड़ी रक़म है तो प्रोफ़ेसर ने अपनी अध्ययन रिपोर्ट उन्हें सौंपने से इंकार कर दिया। कुछ हफ़्तों बाद बीज़ेल और उनके साथियों ने यह रक़म अदा करने का फ़ैसला किया। इसी शोध रिपोर्ट के आधार पर फ़ैसला किया गया कि काले पदार्थ को बाज़ार में बेचा जाए। नतीजे में 1859 में पेंसिलवैनिया में एडविन ड्रेक ने पहला कुआं खोदा।
तेल शुरू से ही अपने मालिकों के लिए मुसीबतें लेकर आया
उस समय तेल को व्हिस्की के बैरल में रखा गया इसी लिए इसकी मापक इकाई बैरल बन गया। जब तेल की क़ीमत दो डालर प्रति बैरल पहुंच गई तो बहुत से निवेशक इस मैदान में कूद पड़े, उत्पादन बढ़ गया और तेल की क़ीमत इतनी गिर गई कि तेल निकालने का ख़र्च भी उससे नहीं निकल पाता था। यही इस बार हुआ है जब बाज़ार में तेल की सप्लाई डिमांड से ज़्यादा हो गई है।
एक घटना यह भी हो गई कि एक चेराग़ से चिंगारी निकली और बैरल के भीतर रखे तेल से निकल रही गैस में आग लग गई। ड्रेक को इस बीच जो आमदनी हुई थी वह उन्होंने जाकर वाल स्ट्रीट में इनवेस्ट कर दी मगर 1866 में उन्होंने अपने दीवालिया होने का एलान किया।
पहले तो तेल पर कंपनियों का नियंत्रण हुआ उसके बाद वाले चरण में अमरीकी सरकार भी कंपनियों के साथ शामिल हो गई और तीसरे चरण में अमरीका ने ओपेक को अपना हथकंडा बनाकर पूरे तेल उद्योग पर नियंत्रण कर लिया।
अमरीका ने ओपेक के माध्यम से तेल के बाज़ारों पर अपना नियंत्रण मज़बूत करने के साथ ही शेल आयल का उत्पादन बढ़ा दिया। नतीजे में अमरीका की ज़रूरत का तेल देश के भीतर ही पैदा होने लगा और उसने बाहर से तेल ख़रीदना कम कर दिया। इस तरह बाज़ार में तेल की सप्लाई ज़्यादा और डिमांड कम हो गई। अब तेल उत्पादक देश अपना उत्पादन कम करने पर मजबूर थे जबकि अमरीका अपना उत्पादन कम करने के लिए तैयार नहीं था। अमरीका तो केवल फ़ायदे का साथी है घाटे में वह कभी नहीं हाथ बंटाता।
यह भी तय है कि सऊदी अरब ने तेल की सप्लाई बढ़ाने का फ़ैसला अमरीका के इशारे पर किया है। कोशिश यह थी कि तेल की सप्लाई से अमरीकी तेल कंपनियों को नुक़सान ज़रूर पहुंचेगा लेकिन यह नुक़सान बहुत ज़्यादा नहीं होगा और सीमित समय के लिए होगा जबकि इस बीच रूस अपना तेल उत्पादन कम करने पर मजबूर हो जाएगा। हालांकि यह फ़ैसला आत्मघाती साबित हुआ सऊदी अरब के लिए भी और अमरीका के लिए भी।
तेल की क़ीमतें गिर कर 20 डालर प्रति बैरल पर पहुंच गई हैं। इसका मतलब यह है कि सऊदी अरब को एक साल में 219 अरब डालर का घाटा होगा। तो सऊदी अरब के तेल उत्पादन बढ़ाने के फ़ैसले को आत्मघाती क़दम के अलावा और क्या कहा जा सकता है।
फ़ार्स खाड़ी के पहले युद्ध के बाद सऊदी अरब भारी बजट घाटे में पड़ गया था तो उसने अमरीका में अपने बांड बेचने की कोशिश की मगर अमरीका ने कहा कि वह अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं से क़र्ज़ ले बांड न बेचे। इस समय भी सऊदी अरब क़र्ज़ ले रहा है जबकि अमरीकी ख़ज़ाने में उसके बांड मौजूद हैं।
यह लिखते हुए हमें दुख है कि क्योंकि अरब हमारे भाई हैं और उनका नुक़सान हमारा नुक़सान है।
डाक्टर अब्दुल हय ज़लूम
शोधकर्ता और लेखक